
- एक दशक से ज्यादा समय से पुलिस के साथ रह रही उस पगली ने कुछ ऐसा रिश्ता बना दिया था, कि उसकी मौत पुलिस के बरामदे में ही हुई, और उसके अंतिम संस्कार में भीरा पुलिस अर्थी को कांधा देते समय नम आंखों को छिपाती रही।
अब्दुल सलीम खान। (TheUpTopVoice)। ये कहानी है एक राखी की डोर की, ये कहानी उस खाकी की, जिसे सब पत्थर दिल कहते हैं। ये कहानी उन रिश्तों की है जिसे बनाने वाले और निभाने वालों ने कभी उसका असली नाम तक नही जानना चाहा, बस जिम्मेदारी निभाते रहे।

- यहां 2003 से शुरू होती है कौशल्या की कहानी
कौसल्या नाम था उसका… बपैय्या तो वो खुद ही कहने लगी।
साल 2004 था, जनवरी का माह था। जब पहली बार मैंने उस पर खबर की थी, बेटे के सिर पर गृहस्थी का बोझ था । पूर्व सांसद रवि प्रकाश वर्मा रामनगर कला में एक जनसम्पर्क कर रहे थे। नदी के किनारे से अपने 7 साल के बेटे के सिर पर गन्ना के अगौले रखकर वो आ रही थी। तब बताया था कि उसके पति की जमीन नदी में है, लोग कब्जा नही छोड़ रहे है।
वर्मा जी ने पूछा कि बेटे स्कूल क्यो नही जाते, तो बताया कि इसके पति की मौत हो गयी है। बेटा थोड़ी मजदूरी कर लेता है। माँ हाथ बता देती, तब माँ, बेटे और 5 साल की बेटी का पेट भरता है। तब उनकी मां अर्धविक्षिप्त इतनी नही थी।

फिर साल 2009 में कौसल्या पर खबर की,”विक्षिप्त माँ के आंचल में महफूज बचपन”, उस के एक दिन बाद मदर डे था, तब कौसल्या सरकारी असपताल में बरामदे में पड़ी रहती थी। मदर डे पर स्टोरी करने का मेरा मकसद था कि उसकी 8 या 9 साल की बेटी माँ के साथ ही घर छोड़ कर रहने लगी थी। कहने को रामनगर में घर था, लेकिन तब सिर्फ यादे थीं रामनगर से उसकी। 12 या 14 साल बेटा कैसे भी मजदूरी करके पेट पाल लेता था। लेकिन तब तक मा ज्यादा विक्षिप्त हो चुकी थी, बेटी भी थी। शायद मुझे लगता था कि अपनी बेटी को बचाने के लिए वो पागल बनी थी, या वो 10 साल की लौंग श्री बिटिया अपनी पहली माँ को बचाने के लिए साथ मे कभी अस्पताल कभी ब्लॉक के किनारे पड़ी रहती थी। खुदा जाने कौन किसके लिए त्याग कर रहा था।
एक बार फिर खबर लिखी जब बेटी बड़ी होने लगी तो परिवार और गांव के लोग उसे लिवा ले गए, कौशल्या को भी ले गए। लेकिन तब तक कौशल्या सब भूल चुकी थी। बेटे को भी और संसार के रिश्तों को भी। बेटे को आवास मिला , वो मां को लेने आया, लेकर घर गया। वो नही रुकी। सब जान चुके थे, उसकी दुनिया अब कुछ और है।

बिजुआ की बाजार और पुलिस चौकी से ऐसा रिश्ता था कि उस पगली को यहां परिवार से ज्यादा दुलार मिला।
बिजुआ पुलिस चौकी पर तो कई दरोगा, और सिपाही उससे राखीं बन्धा कर मुंह बोले भाई बन चुके थे। सुनीत कुमार चौकी इंचार्ज, लल्ला गोस्वामी, विपिन कुमार समेत सभी ने बख़ूबी जिम्मेदारी निभाई। उस पगली का बिस्तर चौकी पर ही लगता था। हर रोज का खना और चाय उसे चौकी से ही मिलती थी। सभी त्यौहार पर कपड़ा और पुलिस वालों के त्यौहार उसके साथ ही मनाते थे।आखिरी रात को कौसल्या या बपैय्या ने पुलिस वालों के साथ मिलकर दिवाली मनाई। रोज की तरह वो चौकी पर ही सो गई, लेकिन सुबह उसके लिए नही हुई।
लेकिन उसके अंतिम संस्कार में भीरा पुलिस का पूरा स्टाफ एसओ अजय राय, चौकी इन्चार्ज लल्ला गोस्वामी समेत सबने कांधा दिया।
भले बेटे ने मुखाग्नि दी हो, लेकिन खाकी ने राखी का फर्ज बखूबी निभाया।






