- सरयू नदी के ऊपर बना लकड़ी का पुल गांवों को नहीं दिलों को भी जोड़ता है. यह पुल सरकारी मशीनरी और नेताओं के लिए आईना है, अफसरों नेताओं ने जब ग्रामीणों के दर्द को नहीं सुना तो गुरुद्वारा साहिब, सिख संगत समेत तमाम गांव वाले खुद ही इस पुल को बनाने में जुट गए और अपने खर्चे से पुल बना दिया।

(The_UpTop_Voice) लखीमपुर / सिंगाही खीरी। सरकारी मशीनरी और नेताओं को आइना दिखाती ये लकड़ी के पुल की तस्वीर यूपी के लखीमपुर जिले से आई है। यहां भारत नेपाल सीमा से सटे गाँवों के बीच सरयू ने मीलों का फासला कर दिया था। इस नदी पर लकड़ी के अस्थाई पुल के निर्माण के लिए ग्रामीण जब अफसरों और नेताओं के ड्योढ़ी पर माथा रगड़ कर थक गए, तो गुरुद्वारा साहिब से फरियाद लगाई, किसानों की फरियाद पर गुरुद्वारा कमेटी ने रुपए खर्च कर लकड़ी का पुल बनवा दिया। साथ ही सिख समाज के साथ इलाकाई लोग भी जुटे।
सरकारी हुक्मरानों के लिए सरयू नदी के उपर बना मांझा का पुल जनप्रतिनिधियों को आइना दिखाता है। सिख संगत और ग्रामीणों के सहयोग से बनाया ये 80 मीटर लंबा लकड़ी का पुल से कई गांव अब मुख्यधारा से जुड़ गए हैं। अब पुल से कई गांवों का सीधा संपर्क निकटवर्ती मुख्य बाजार सिंगाही, निघासन समेत जिला मुख्यालय से हो गया है।

‘जज्बे की स्याही से’ लिखी गई इस इबारत को लोग सलाम कर रहे हैं। ग्रामीणों के हौसले और समाज के लिये कुछ कर गुजरने का जज्बे ने बड़ी कहानी रच दी है।
दरअसल निघासन तहसील की ग्राम पंचायत मांझा सरयू नदी के दूसरी ओर बसा है। मांझा के लोगों को सरकारी अस्पताल, थाना और जरूरत की चीजों के लिए के लिए तीन किमी की दूरी को 30 किमी का फेरा लगाकर आना पड़ता था, सबसे नजदीक की बाजार सिंगाही हैं, यहाँ से उन लोगों की रोजमर्रा जरूरत की चीजे लेनी होती हैं । लेकिन गांव और मुख्य बाजार के बीच सरयू नदी पड़ती है। नदी पर कोई पुल नही है। पुल के लिए लोगों ने अफसरों और नेताओं से फरियाद की, लेकिन पुल नही बन सका । सरकारों की अनदेखी के बाद किसानों ने अपने दम पर सरयू नदी पर लगभग सौ मीटर लम्बा मजबूत अस्थाई लकड़ी पुल बनाकर तैयार कर दिया। पुल को बनाने में तकरीबन एक लाख रुपये का खर्च आता है, जिसे गांव के गुरद्वारा कमेटी ने मिलकर वहन कर लिया।
- पास के कस्बे और बाजार जाने को लगता था 25 किमी का चक्कर
- गांव के पड़ोस में बहने वाली सरयू नदी पर पुल न होने से ग्रामीणों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था। बेलरायां रास्ते से तहसील जाने के लिए करीब 25 किमी का चक्कर लगाना पड़ता था। गांव के ग्रामीणों ने इस बाबत कई बार अफसरों व माननीयों से गुजारिश की जो बेकार गई। इसके बाद ग्रामीणों ने खुद पुल बनाने का संकल्प लिया। ग्रामीणों के जज्बे का आलम यह रहा कि सौ मीटर लंबा लकड़ी का पुल बनकर तैयार हो गया। पुल निर्माण में अहम भूमिका निभाने वाले पूर्व प्रधान परमजीत सिंह पम्मी, बलकार सिंह, भगवंत सिंह, सिमरनजीत सिंह, हरविंदर सिंह, सतनाम सिंह, गुरमुख सिंह, सरवन सिंह ने बताया कि पुल निर्माण कराने के लिए जनप्रतिनिधियों से लेकर जिला मुख्यालय तक के चक्कर लगाए, लेकिन किसी ने भी इस पुल को बनवाने की पहल नहीं की। इसीलिए तैयार पुल का उद्घाटन गुरुद्वारा कमेटी द्वारा किया गया। यह जनप्रतिनिधियों के लिए एक सबक है। हर साल यहां नदी पुल को बहा ले जाती है और हर साल यहाँ के लोग इसे फिर से बनाते हैं।
- (इनपुट- मसरूर खान)





